लेखक: ध्रुवभारत (1 सितम्बर 2004)
आवाज़: ध्रुवभारत  

हृदय चाहता तुमको पाना, तुम बैठी सागर उस पार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

स्मृति समान संदेश तुम्हारे, निरंतर आते रहते हैं
शब्दो में ही देख तुम्हे हम, प्रेम से निज लोचन भर लेते हैं
पढ़ते पढ़ते ही अधरों पर, एक हंसी जो खेल गई
यह नई दशा है मेरी, और अनुभूती भी यह नई

अब जब तुमने खींच लिया है, मत छोड़ना बीच मझधार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

तुम आओगी विश्वास इसी पर, मैनें जीवन आधार किया
परे तुम्हारे अपने जगत का, नहीं मैंने विस्तार किया
नयन प्रतीक्षारत हैं मेरे, प्राणो में आशा की ज्योती
आभार तुम्हारी प्रतीक्षा का, क्या करता जो यह भी ना होती

निशि वासर में भेद नहीं है, बिना तुम्हारे सूना संसार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

फूलों ने रंग त्याग दिए हैं, कलियाँ मुरझा कर टूट रहीं
बुलबुल गुमसुम सी बैठी है, कोयल देती अब कूक नहीं
बेल बिटप पल्लव उदास हैं, रूका हुआ अलि कली का रास
इन सबको जीवन दे सकता, तुम्हारे मुखमंडल का हास

मेरे मन उपवन से दखो, रूठ गई है बसंत बहार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

खो दी शोभा और ऋतुराज, पतझड़ में बदल गए
समय की खा कर चोट, पाषाण भी हो जर्जर गए
निसर्ग का नियम यही है, जब भी है यौवन आया
उसी क्षण से मंडराने लगता, ढल जाने का साया

पल पल जगत है ढलता रहता, पर अजर रहा है मेरा प्यार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

सृष्टि तो है चल रही, पर मेरा जीवन ठहर गया
सुबह समय पर होती है, पर जाने कहाँ तमहर गया
समय रूका हुआ है मानो, कि बढे तभी जब तुम आओ
मेरे जीवन की घडियाँ ही कितनी, जो हैं आओ, संग बिताओ

हम दोनो ही तो हैं, इक दूजे के जीवन का सार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

बिना तुम्हारे सौन्दर्य के, कहो कैसे बहे काव्य सरिता?
बिना तुम्हारे प्रेम के कहो, कैसे करूँ पूर्ण कविता?
मैं पूर्णता पाऊँ तभी, जब तुमसे मिट जाए मेरी दूरी
बिना तुम्हारे हे प्रियतमा, मैं अधूरा, मेरी हर रचना अधूरी

दरस मेरे नयनों को दे दो, यही मैं चाहूँ बारम्बार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

हृदय चाहता तुमको पाना, तुम बैठी सागर उस पार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, बस इक बार, प्रिय इक बार

आज का दिन बड़े तेज़ बुख़ार के कारण पलंग पर पड़े हुए बीत रहा है। सोचने के अलावा और कुछ कर सकने की शक्ति दिन भर नहीं रही। जब इंसान बीमार होता है, असहाय होता है तो उसे सहायता के साथ-साथ सहानुभूति की भी ज़रूरत होती है; परन्तु आजकल की दौड़-धूप भरी ज़िन्दगी में सब कुछ कह कर मांगना पड़ता है -इंसान में से संवेदनशीलता मिटती जा रही है। किसी को किसी ख़बर नहीं रहती। लेकिन ईश्वर ने माँ को ना जाने कैसे बनाया है कि प्रेम, करुणा और संवेदना उसमें कूट-कूट कर भरी है। माँ से कुछ मांगना नहीं पड़ता। वह संतान की दुख-तकलीफ़ स्वयं ही जान जाती है। पता नहीं कैसे। कितना भी छिपाओ, माँ को पता चल ही जाता है।

कोई अदृश्य धागा है जो माँ को संतान से बांधता है।

पिछले कुछ समय से एक परेशान कर देने वाली निरन्तरता के साथ नज़रो के सामने ऐसी (नई, पुरानी) पोस्ट्स और टिप्पणियाँ आ रही हैं जिनके लेखक निश्चित रूप से बेहतर और सभ्य  भाषा कर सकते थे। लेकिन ऐसा उन्होनें किया नहीं। अब ब्लॉग को लेखक भी हल्के ढंग से ही लेते जान पड़ते हैं। कहा जाता है कि तलवार का एक वार एक व्यक्ति को घायल करता है लेकिन कलम के लिखे हुए बुरे शब्द  असंख्य लोगो को आहत कर सकते हैं।

हो सकता है कि इस बारे में पहले भी किसी ने सोचा और लिखा हो; लेकिन मैनें कहीं भी इस बारे में चर्चा नहीं देखी। लेखन में शिष्ट भाषा के प्रयोग पर चर्चा होनी चाहिये। मेरा मानना है हिन्दी ब्लॉगिंग (या किसी भी अन्य भाषा की ब्लॉगिंग) में वैब शिष्टाचार के कुछ मूल नियमों का पालन होना चाहिये। ऑनलाइन कम्यूनिटी भी तो एक समाज है; जब हम अपने वास्तविक समाज में शिष्टाचार के नियमों का पालन करते हैं तो इस ऑनलाइन समाज में क्यों नहीं? हो सकता है कि वास्तविक समाज में बहुत से लोग सज़ा के डर से शिष्ट व्यवहार करते हों। जो लोग शिष्टता नहीं दिखाते उन्हें एक किस्म से समाज से काट दिया जाता है। उनसे मिलने-जुलने वाले बात करने वाले लोगों की संख्या कम होने लगती है। तो ऐसा ही ऑनलाइन समाज में क्यों नहीं होता? कुछ दिन पहले विनीत के ताना-बाना नामक ब्लॉग पर सराय में हुई मीटिंग की चर्चा पढ़ी तो पाया कि वहां भी लोग इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि अब पाठक का राज होना चाहिये। पाठकों को अशिष्ट सामग्री को बढ़ावा देने की बजाय उससे कन्नी काटनी चाहिये।

मेरे विचार से कम से कम इन तीन शिष्टाचार नियमों का पालन होना चाहिये:
  1. अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखने के बाद आप अपनी एड्रेस बुक में जितने लोग हैं उन सबको ईमेल ना भेजें कि आइये और मेरी पोस्ट पढ़िये। मेरे मेल बॉक्स में रोज़ इस तरह कि दो-तीन ईमेल्स तो आती ही हैं। ब्लॉगर्स को समझना चाहिये कि Google Friend Connect और Feedburner जैसे विकल्प पाठक के पास हैं और इनकी मदद से वह जिन ब्लॉग्स के बारे में जानना चाहता है उनके बारे में जान सकता है। अपने लिखे को थोपिये मत!

  2. टिप्पणियों को विज्ञापन का साधन ना बनाया जाये। टिप्पणी के अंत में अपने निजी ब्लॉग या अन्य वैबसाइट का लिंक तभी दें जब वाकई पोस्ट के संदर्भ में उसकी ज़रूरत हो।

  3. अशिष्ट भाषा या कटुव्ययंगों से बचना चाहिये। आप किसी के बारे में बुरा कह कर या उसका मज़ाक उड़ा कर कुछ हांसिल नहीं करते हैं। जीवन का चक्र इन बुरे वचनों से प्रभावित नहीं होता और चलता रहता है। ब्लॉग्स पर कितना कुछ असभ्य लिखा जा चुका है लेकिन क्या किसी के बारे में ऐसा लिख देने से दुनिया रुक गयी या बदल गयी? संयमित भाषा में रचनात्मक टिप्पणी आपके महत्व को बढाती है; कम नहीं करती। असभ्य भाषा कुछ पलों के लिये कहने वाले को सुकून दे सकती है लेकिन उसका प्रभाव कहने वाले व्यक्ति और उसके संबंधो पर बुरा ही पड़ता है।
इसी संदर्भ में यह भी कहा जाना चाहिये कि ब्लॉगर्स भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। नई शब्द-रचना और वाक्य-रचना के लिये यह माध्यम पोषक वातावरण उपलब्ध कराता है। लेकिन यही माध्यम हिन्दी भाषा को बिगाड़ भी सकता है। असंयमित और असभ्य वाक्यों का प्रयोग इस माध्यम के महत्व को हल्का कर देगा और एक सामान्य पाठक को यही लगेगा कि हिन्दी ब्लॉग तो टाइम-पास करने और लेखक द्वारा अपनी कुंठाओं के मनोरंजन का माध्यम मात्र है। शब्दों का चयन करते समय हमें यह सोचना चाहिये कि आज नहीं तो कल हमारे माता-पिता, बच्चे, भाई-बहन, मित्र या अन्य रिश्तेदार हमारे लिखे शब्दों को पढ़ेंगे। लिखने से पहले सोचे कि हम उन्हें क्या पढ़ाना चाहते हैं और हम उनकी दृष्टि में कैसा दिखाना चाहते हैं।

भला कितना मुश्किल है एक-दूसरे के विचारों को सम्मान देना? और कितना मुश्किल है अपनी असहमति को सभ्य भाषा में ज़ाहिर करना? कम ही सही लेकिन कई हिन्दी ब्लॉगर्स इस माध्यम का बहुत अच्छा उपयोग करते दिखते हैं। हमें चाहिये कि हम एक-दूसरे के लेखन से और सौम्य व्यहवार से सीखें और इसे अपने को बेहतर बनाने में प्रयोग करें।

लेखक: ध्रुवभारत
14 फ़रवरी 2007
किसी ख़ामोश शाम को जब मैं
बैठा अकेला क्षितिज की ओर
शून्य में निहार रहा होंऊ
किसी गहरी उदासी में गुम

तब कोई बैठे पास आकर
और पूछे प्यार से
अपनेपन और अधिकार से
"क्या बात है?"
मैं चाहूँ कुछ कहना
किन्तु यदि वाणी न दे साथ
तब कोई मेरे मन को
मेरे चेहरे से पढ़ ले
और थाम ले मेरा हाथ
मुझे बताने को कि मैं
अकेला नहीं हूँ

ज़िन्दगी क्या तुम ऐसा करोगी?
आकर पास बैठोगी?
उदास अकेला होंऊगा
किसी खामोश शाम को जब मैं

लेखक: ध्रुवभारत
14 जनवरी 2010, मंगलवार, 4:00 सांय
जान पहचान
दोस्ती मोहब्बत के
कुछ धागे
लोग मुझसे भी बांधते हैं
ये धागे बहुत अधिक नहीं
और कमज़ोर भी होते हैं
ज़्यादा वक़्त नहीं चलते
जब किसी को कोई धागा
नहीं सुहाता
तो वो उसे खींच देता है
रिश्ता टूट जाता है
और मैं तन्हाई की गहराई में
कुछ और
डूब जाता हूँ

लेखक: ध्रुवभारत
12 जनवरी 2010, मंगलवार, 5:30 सांय
ज़िद ना करो
मुझे बिखर जाने दो
इतनी दरारें पड़ चुकी हैं
मुझे एक बार तो टूट कर
बिखरना ही होगा
तुम ज़िद ना करो
कि मुझे संवार लोगी
प्यार भरा तुम्हारा
एक लफ़्ज़ भी
अकेलेपन से बंधे
टूटे हुए मन से
सहा ना जाएगा
मारे खुशी के
साज़े-धड़कन ही
थम जाएगा

नहीं, तुम यूं ना
मुझे सहारा देने की बातें करो
मत कहो कि दुख मेरे
तुम्हारे हैं
मुझसे कुछ मत कहो
बस, ज़रा छू दो मुझे
कि मैं टूट जाऊं
तुम्हारी छुअन
अकेलेपन के बंधन को तोड़ देगी
और मैं आंसू की लड़ियों-सा
बिखर जाऊंगा

फिर अगर चाहो तो
समेट लेना
मेरे बिखरे हुए टुकड़ों को
और अपने प्यार से
इन्हें फिर जोड़ना
मुझे यकीं है
तुम्हारा प्यार
मुझे एक नई ज़िन्दगी देगा
और देगा एक मन
जो टूटा हुआ नहीं होगा

लेकिन, अभी
तुम ज़िद ना करो...

बीते कुछ दिन से मैं स्वयं के बारे अच्छा अनुभव नहीं कर पा रहा हूँ। एक बेचैनी-सी है मन में; स्वयं का अस्तित्व कुछ गंदा-सा अनुभव हो रहा है। इसके पीछे कारण है कि मैनें कुछ दिन पहले एक निकट मित्र से एक झूठ बोला। यूं तो हर किसी की तरह मैं भी दिन में पाँच-सात झूठ बातें बोल ही देता हूँ लेकिन इस तरह के झूठ हमारे जीवन के सुचारू-रूप से चलने के लिये शायद आवश्यक होते हैं। यहाँ मुझे जिम कैरी की फ़िल्म "लायर लायर" की याद आ रही है। इस फ़िल्म में जिम ने एक सफ़ल वकील का क़िरदार अदा किया है। लेकिन सफ़लता अक्सर व्यक्ति को अपनो से दूर कर देती है और जिम के साथ भी फ़िल्म में ऐसा ही कुछ हुआ। पत्नी से तलाक़ हो जाता है और उसका 7-8 वर्ष का बेटा अपनी माँ के साथ रहने लगता है। एक बार जिम अपने बेटे के जन्मदिन पर भी नहीं पँहुच पाता और कोई झूठा बहाना बना देता है। इस पर बेटा मन ही मन एक दुआ मांगता है कि उसके पिता एक दिन के लिये ना तो झूठ बोल पायें और ना ही अपने मन में आ रही बातों को छुपा पायें। बेटे की दुआ रंग लाती है और एक दिन के लिये जिम के जीवन में क्या-क्या घटता है यह तो फ़िल्म देख कर ही समझा जा सकता है। यह एक अच्छी कॉमेडी फ़िल्म है।

बहरहाल, झूठ तो हम सभी बोलते हैं। झूठ जो किसी को किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष नुकसान ना पँहुचाए; ऐसे झूठ मान्य भी होते हैं। हालांकि कई बार ऐसा होता है कि झूठ बोलने वाले व्यक्ति के तर्कानुसार कोई नुकसान नहीं हो रहा होता पर अन्य व्यक्ति को शायद और कुछ नहीं तो मानसिक नुकसान हो रहा हो; यह संभव है। मैनें भी ऐसा ही कुछ सोचा था। मैं अमूमन झूठ नहीं बोलता और जो लोग मेरे निकट हैं उनसे तो कतई नहीं। लेकिन इस बार मैनें सोचा कि मेरा सत्य शायद सामने वाले को दुख पँहुचाएगा और मैनें इस बात का ख़्याल करते हुए झूठ कह दिया। लेकिन उस व्यक्ति को मुझ पर शायद विश्वास नहीं हुआ और उसने मुझसे अपनी झूठ बात दोहराने को कहा तो मैं दूसरी बार झूठ नहीं कह पाया। शायद इसी को मित्रता और प्रेम कहा जाता है। किसी निकट मित्र ने आपसे इस विश्वास के साथ कुछ पूछा कि आप सच कहेंगे; तो आप झूठ कैसे कह सकते हैं?

दूसरी बार में मैनें सच कह दिया। लेकिन इस बात का दुख है कि मैनें पहली बार में झूठ कहा। सच और झूठ के दर्शन की कोई भी बात इस सुभाषितानी के बिना अधूरी रहती है:

सत्यं वदं, प्रियं वदं
न वदं सत्यमप्रियात

यह बात बिल्कुल सही है। पर मेरे विचार कुछ संबंध ऐसे होते हैं जिनमें सत्य चाहे कितना भी कटु क्यों ना हो लेकिन उसे कहना चाहिये। ऐसे रिश्तों में बंधे लोग एक-दूसरे पर इतना अधिक विश्वास करते हैं कि सत्य की कड़वाहट को वे पी जाते हैं और कभी साथ नहीं छोड़ते; रिश्ता नहीं तोड़ते। ऐसे रिश्ते दुर्लभ हैं लेकिन ऐसे रिश्ते हमारे जीवन का हांसिल होते हैं।

मैं कुछ दिन में इस दुख से उबर जाऊंगा लेकिन इस निश्चय के साथ कि मैं अपने निकट के लोगों से झूठ नहीं कहूंगा। ऐसे लोगो से पहले मेरे झूठ कहने की संभावना यदि दस लाख में एक बार थी; तो अब इसे दस करोड़ में एक बार हो जाना चाहिये। सत्य को कहा जाना चाहिये; आपकी ग़लती है तो अपनी ग़लती मानते हुए कहना चाहिये; लेकिन कहना चाहिये क्योंकि सत्य कहना संबंध का सम्मान होता है।

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